Banking Crisis: तीन बड़े बैंक डूबे, दो ट्रिलियन डॉलर स्वाहा… अमेरिका को कहां ले जाएगी ये तबाही


नई दिल्ली: अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी इकॉनमी है। वहां कुछ भी हलचल होती है तो इसका असर पूरी दुनिया में दिखाई देता है। इन दिनों अमेरिका बैंकिंग संकट (Banking Crisis) से जूझ रहा है। दो महीने में देश के तीन बड़े बैंक डूब चुके हैं। इसे 2008 के बाद सबसे बड़ा फाइनेंशियल क्राइसिस माना जा रहा है। पिछले महीने सिलिकॉन वैली बैंक (Silicon Valley Bank) और सिग्नेचर बैंक (Signature Bank) डूबे थे और इस महीने फर्स्ट रिपब्लिक बैंक (First Republic Bank) ने दम तोड़ दिया। इन तीन बैंकों के एसेट करीब 530 अरब डॉलर था। इतना ही कम से कम दस रीजनल बैंकों पर भी डूबने का खतरा मंडरा रहा है। इस बैंकों के शेयरों में इस साल 75 फीसदी तक गिरावट आई है। इस साल एक जनवरी से अब तक पूरे बैंकिंग सेक्टर का मार्केट कैप दो लाख करोड़ डॉलर कम हो चुका है। सवाल यह है कि यह तबाही आखिर कब रुकेगी।

अमेरिका में पिछले 100 साल में करीब 27,000 बैंक डूब चुके हैं। माना जा रहा है कि सैकड़ों बैंकों पर डूबने का खतरा मंडरा रहा है। लेकिन दस बैंकों की हालत खराब है। इन बैंकों के शेयरों में इस साल 75 फीसदी तक गिरावट आई है। इनमें पहले स्थान पर होमस्ट्रीट (HomeStreet) है। इसके शेयरों में 75 फीसदी गिरावट आई है। PacWest के शेयरों में 71%, Metropolitan Bank में 64%, Zions Bank में 51%, Western Alliance में 47%, KeyCorp में 45%, HarborOne में 39%, Valley National में 35%, Truist में 33% और Citizens Financial के शेयरों में 32% गिरावट आई है। लोग रीजनल बैंकों से पैसे निकालकर बड़े बैंकों में जमा कर रहे हैं। यानी आने वाले दिनों में अमेरिका में बैंकिंग संकट और गहरा सकता है।

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पहली बार डिफॉल्टर बनेगा अमेरिका!

इस बीच अमेरिका की वित्त मंत्री जेनेट येलेन ने चेतावनी दी है कि अगर एक जून तक संसद ने डेट सीलिंग को बढ़ाने या सस्पेंड करने की मंजूरी नहीं दी तो देश में नकदी का संकट खड़ा हो सकता है। डेट सीलिंग पर पहुंचने के बाद सरकार और ज्यादा उधारी नहीं ले सकेगी। देश में 1960 के बाद से 78 बाद डेट लिमिट में बदलाव कर चुकी है। इसे नहीं बढ़ाया गया तो अमेरिका इतिहास में पहली बार डिफॉल्ट कर सकता है। जानकारों का कहना है कि डिफॉल्ट होने से देश में मंदी आ सकती है और बेरोजगारी चरम पर पहुंच सकती है। सरकारी कर्मचारियों और सैनिकों को सैलरी नहीं मिलेगी, सोशल सिक्योरिटी के बेनिफिशियरी प्रभावित होंगे। यहां तक कि मौसम का पूर्वानुमान भी प्रभावित होगा। देश में कई लोग नेशनल वेदर सर्विस के डेटा का इस्तेमाल करता है जो केंद्र सरकार के फंड से चलता है।



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